Tuesday, April 13, 2010

देखो शादी के हैं कितने फायदे




एक नए शोध के अनुसार विवाहित लोगों में कैंसर का सामना करने की संभावना अधिक होती है जबकि ऐसे लोगों के लिए कैंसर से बचना मुश्किल हो सकता है जिनकी शादी टूटने की स्थिति में है। अमेरिका के इंडियाना विश्वविद्यालय ने 1973 से 2004 के बीच 38 लाख कैंसर रोगियों के आँकड़ों का अध्ययन करने के बाद ये निष्कर्ष निकाला है।शोधकर्ताओं ने पाया कि शादीशुदा कैंसर रोगियों के लिए रोग होने के बाद पाँच साल तक जीवित रह पाने की संभावना 63 प्रतिशत होती है। लेकिन इसकी तुलना में ऐसे विवाहित लोगों के कैंसर से पाँच साल तक लड़ पाने की संभावना 45 प्रतिशत होती है जिनकी शादी टूटने के कगार पर है।विज्ञान जर्नल कैंसर में प्रकाशित होनेवाली शोध रिपोर्ट में कहा गया है कि संभवतः शादी टूटने के तनाव के कारण रोगियों के कैंसर से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है।इसके पूर्व भी शादी और स्वास्थ्य को लेकर अध्ययन किए गए हैं। इनमें कई अध्ययनों में पाया गया है कि जीवनसंगी का प्रेम और साथ रोग से लड़ने के लिए बहुत आवश्यक होता है।शोध : शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन के दौरान विवाहित, अविवाहित, विधवा-विधुर, तलाकशुदा और शादी टूटने की स्थिति वाले कैंसर रोगियों के बारे में अध्ययन किया और ये पता लगाने का प्रयास किया कि इनमें से कितने लोग कैंसर के बाद पाँच से 10 साल तक जीवित रह पाते हैं।उन्होंने पाया कि विवाहित और अविवाहित रोगियों के कैंसर से लड़ पाने की संभावना सबसे अधिक रही। उनके बाद तलाकशुदा और विधवा-विधुर रोगियों का स्थान आता है।इस शोध की मुख्य वैज्ञानिक डॉक्टर ग्वेन स्प्रेन ने कहा कि इस अध्ययन से ये पता चलता है कि कैंसर रोगियों में ऐसे लोगों पर सबसे अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए जिनकी शादी टूटने वाली है।उन्होंने कहा, 'इलाज के दौरान रिश्तों के कारण होनेवाले तनाव की पहचान करने से चिकित्सक और पहले हस्तक्षेप कर सकेंगे जिससे कि रोगियों के बचने की संभावना बेहतर हो सकती है।' मगर उन्होंने कहा कि इस दिशा में और अध्ययन किए जाने की आवश्यकता है।ब्रिटेन की संस्था कैंसर रिसर्च के प्रमुख सूचना अधिकारी ने भी कहा है कि इस शोध के निष्कर्ष को अंतिम निष्कर्ष नहीं समझा जाना चाहिए और शादी टूटने की स्थिति वाले रोगियों के कैंसर से लड़ पाने की क्षमता कम होने के और भी कई कारण हो सकते हैं। ( बीबीसी से)

आखिर एवरेस्ट को नाप ही लिया




दुनिया की सबसे ऊँची चोटी मानी जाने वाली एवरेस्ट की ऊँचाई पर पिछले काफी समय से चल रहे विवाद के समाधान के लिए नेपाल और चीन सहमत हो गए हैं।दोनों देश अब इस बात पर सहमत हैं कि एवरेस्ट की ऊँचाई 8,848 मीटर मानी जाएगी. नेपाल और चीन की सीमाएँ इस पर्वत श्रृंखला से लगी हुई हैं।इस मसले पर चीन पहले कहता रहा है कि इसकी ऊँचाई चट्टानों को आधार बनाकर नापी जाए जबकि नेपाल का कहना था कि इसे चट्टानों पर जमीं बर्फ के आधार पर नापी जाए।भारतीय सर्वेक्षण : नेपाल के नजरिए से एवरेस्ट की ऊँचाई चार मीटर अधिक हो रही थी। नेपाल की राजधानी काठमांडू में हुई बातचीत में चीन ने इस बात को स्वीकार कर लिया। इसका मतलब यह हुआ कि अब एवरेस्ट की आधिकारिक ऊँचाई 8,848 मीटर मानी जाएगी।संवाददाताओं का कहना है कि 1953 में तेनजिंग शेरपा और सर एडमंड हिलेरी के पहली बार एवरेस्ट फतह करने के बाद से हजारों लोग वहाँ पहुँच चुके हैं।एवरेस्ट की ऊँचाई पहली बार 1956 में मापी गई थी, लेकिन उसकी ऊँचाई को लेकर तभी से विवाद बना हुआ था। एक भारतीय सर्वेक्षण ने 1955 में पहली बार एवरेस्ट की ऊँचाई 8,848 मीटर मापी थी जिसे आज तक मोटे तौर पर माना जाता था।भारतीय सर्वेक्षण ने ऊँचाई को चोटी की चट्टानों की जगह उसपर पड़ी बर्फ से मापा था। लेकिन भूवैज्ञानिकों का कहना है कि एवरेस्ट की ऊँचाई को लेकर दोनों देशों के अनुमान गलत हो सकते हैं।उनका कहना है कि महाद्वीपीय प्लेटों के स्थानांतरण के कराण भारत ने चीन-नेपाल को नीचे की ओर धकेल दिया है। इससे पर्वत और ऊँचा हो गया है।एक अमेरिकी दल ने 1999 में जीपीएस तकनीकी का उपयोग करते हुए एवरेस्ट की ऊँचाई 8,850 मीटर दर्ज की थी जिसे अमेरिका का नेशनल ज्योग्राफिक सोसाइटी भी मानती है। हालाँकि नेपाल इसे आधिकारिक मान्यता नहीं देता है। (बीबीसी से )

बिना ऑक्सीजन के जीने वाले जीव




वैज्ञानिकों ने पहली बार ऐसे जीवों की खोज की है जो बिना ऑक्सीजन के जी सकते हैं और प्रजनन कर सकते हैं। ये जीव भूमध्यसागर के तल पर मिले हैं।इटली के मार्श पॉलीटेकनिक विश्वविद्यालय में कार्यरत रॉबर्तो दोनोवारो और उनके दल ने इन कवचधारी जीवों की तीन नई प्रजातियों की खोज की है। दोनोवारो ने बीबीसी को बताया कि इन जीवों का आकार करीब एक मिलीमीटर है और ये देखने में कवच युक्त जेलीफ़िश जैसे लगते हैं।प्रोफेसर रॉबर्तो दोनोवारो ने कहा, 'ये गूढ़ रहस्य ही है कि ये जीव बिना ऑक्सीजन के कैसे जी रहे हैं क्योंकि अब तक हम यही जानते थे कि केवल बैक्टीरिया ऑक्सीजन के बिना जी सकते हैं।'भूमध्यसागर की ला अटलांटा घाटी की तलछट में जीवों की खोज करने के लिए पिछले एक दशक में तीन समुद्री अभियान हुए हैं। इसी दौरान इन नन्हे कवचधारी जीवों की खोज हुई।यह घाटी क्रीट द्वीप के पश्चिमी तट से करीब 200 किलोमीटर दूर भूमध्यसागर के भीतर साढ़े तीन किलोमीटर की गहराई में है, जहाँ ऑक्सीजन बिल्कुल नहीं है।नए जीवों के अंडे : प्रोफेसर दानोवारो ने बीबीसी को बताया कि इससे पहले भी बिना ऑक्सीजन वाले क्षेत्र से निकाले गए तलछट में बहुकोशिकीय जीव मिले हैं लेकिन तब ये माना गया कि ये उन जीवों के अवशेष हैं जो पास के ऑक्सीजन युक्त क्षेत्र से वहाँ आकर डूब गए।प्रोफ़ैसर दानोवारो ने कहा, 'हमारे दल ने ला अटलांटा में तीन जीवित प्रजातियाँ पाईं जिनमें से दो के भीतर अंडे भी थे।'हालाँकि इन्हें जीवित बाहर लाना संभव नहीं था लेकिन टीम ने जहाज पर ऑक्सीजन रहित परिस्थितियाँ तैयार करके अंडो को सेने की प्रक्रिया पूरी की। उल्लेखनीय है कि इस ऑक्सीजन रहित वातावरण में इन अंडों से जीव भी निकले।दानोवारो ने कहा, 'यह खोज इस बात का प्रमाण है कि जीव में अपने पर्यावरण के साथ समायोजन करने की असीम क्षमता होती है।'उन्होंने कहा कि दुनिया भर के समुद्रों में मृत क्षेत्र फैलते जा रहे हैं जहाँ भारी मात्रा में नमक है और ऑक्सीजन नहीं है।स्क्रिप्स इंस्टिट्यूशन ऑफ ओशनोग्राफी की लीसा लेविन कहती हैं, 'अभी तक किसी ने ऐसे जीव नहीं खोजे जो बिना ऑक्सीजन के जी सकते हों और प्रजनन कर सकते हों।'उन्होंने कहा कि पृथ्वी के समुद्रों के इन कठोर परिवेशों में जाकर और अध्ययन करने की जरूरत है। इन जीवों की खोज के बाद लगता है कि अन्य ग्रहों पर भी किसी रूप में जीवन हो सकता है जहाँ का वातावरण हमारी पृथ्वी से भिन्न है।(बीबीसी से )